CM कुर्सी से बड़ा था सम्मान: चौधरी सुरेंद्र सिंह की कहानी, जिन्होंने पिता बंसीलाल के लिए छोड़ा मुख्यमंत्री पद का सपना
श्रुति ने बताया कि उनके पिता, पितृ भक्त सुरेंद्र सिंह, अपने पिता बंसीलाल का इतना सम्मान करते थे कि जब बंसीलाल मंच पर भाषण देते थे, तो वे स्वयं आम कार्यकर्ता की तरह मंच से नीचे उतरकर उनका भाषण सुनते थे।

CM कुर्सी से बड़ा था सम्मान : हरियाणा की राजनीति में सादगी, कर्तव्यनिष्ठा और पितृ-भक्ति की मिसाल पेश करने वाले पूर्व मंत्री स्वर्गीय चौधरी सुरेंद्र सिंह की याद में उनकी बेटी श्रुति ने एक भावुक संस्मरण साझा किया है। 15 नवंबर को उनकी जयंती से ठीक पहले, यह संस्मरण बताता है कि क्यों सुरेंद्र सिंह ने राजनीति को लोकसेवा बनाया और कैसे अपने पिता, पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल के सम्मान में उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा दिया गया मुख्यमंत्री पद का ऑफर तक ठुकरा दिया था।
श्रुति ने बताया कि उनके पिता, पितृ भक्त सुरेंद्र सिंह, अपने पिता बंसीलाल का इतना सम्मान करते थे कि जब बंसीलाल मंच पर भाषण देते थे, तो वे स्वयं आम कार्यकर्ता की तरह मंच से नीचे उतरकर उनका भाषण सुनते थे। पितृ भक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण तब सामने आया जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी उन्हें हरियाणा की बागडोर सौंपना चाहते थे।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह ने एक कार्यक्रम में खुलासा किया था कि राजीव गांधी ने सुरेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री बनाने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि “जब तक चौधरी बंसीलाल जी हैं, वे मुख्यमंत्री पद का सपना भी नहीं ले सकते। उनके लिए पिता ही सर्वोपरि हैं।”
पिता की सादगी का जिक्र करते हुए श्रुति ने एक चुनाव प्रचार का किस्सा बताया। उन्होंने देखा कि सुरेंद्र सिंह समर्थकों द्वारा लाई गई फूलों की माला तो ले रहे थे, लेकिन नोटों की माला लौटा रहे थे। पूछने पर उन्होंने कहा, “जब मैं किसी गरीब आदमी को जिसका कुर्ता फटा हुआ हो, उसे दस-दस रुपए की नोटों की माला मेरे स्वागत में पहनाने के लिए खड़ा देखता हूँ, तो मेरा मन दुखी हो जाता है। मेरे मन में बस यही आता है कि मैं इस व्यक्ति का और हजारों लोगों का भला किस तरह कर सकता हूँ।”
किसान परिवार से आने वाले सुरेंद्र सिंह ने 2005 में कृषि मंत्री बनते ही पहली कलम से हरियाणा की जमीनों का राजस्व रिकॉर्ड ऑनलाइन करवा दिया, जिससे किसानों को पटवारियों के चक्कर नहीं लगाने पड़े। उन्होंने किसानों की सुविधा के लिए अनाज मंडियों में किसान रेस्ट हाउस भी बनवाए।
1982 में इंदिरा गांधी के आदेश पर पहली बार कृषि मंत्री बने सुरेंद्र सिंह ला ग्रेजुएट थे और सबसे युवा बार काउंसिल चेयरमैन भी रहे।
युवाओं और किसानों के प्रेरणा स्रोत रहे सुरेंद्र सिंह का अंतिम भाषण 28 मार्च 2005 को हिसार कृषि विश्वविद्यालय में हुआ था, जहाँ उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से खुलकर अनुरोध किया था कि वे ऐसी फसलों की नस्लें तैयार करें जो कम पानी में अधिक पैदावार दे सकें, ताकि प्रदेश के गिरते भूजल स्तर का समाधान हो सके।
31 मार्च 2005 को, चंडीगढ़ से दिल्ली आते समय एक हेलीकॉप्टर हादसे में सम्मानित नेता ओमप्रकाश जिंदल के साथ उनका निधन हो गया। दिल्ली से गोलागढ गाँव तक उनके अंतिम दर्शन के लिए लाखों लोगों की उमड़ी भीड़ ने उनकी लोकप्रियता और जनमानस से उनके गहरे जुड़ाव की गवाही दी।